BLOG-NAMA
हल्द्वानी पहुँच कर गौला अस्तित्वहीन सी लगने लगती है. हम हल्द्वानी वासी बस, इसे रेता-बजरी की खान से अधिक कुछ नहीं समझते. रेत, बजरी, रोड़ियों और पत्थरों से भरा इसका विशाल पाट हमारे मनों में कोई भावना नहीं जगाता. क्योंकि नदी तो बस एक पतली सी जलधारा रह जाती है. इसकी छाती पर सवार सैकड़ों ट्रक और डम्पर इसके अक्षय उदर से रेत और बजरी निकालते ही रहते हैं. और पूरे भाबर और कुमाओं के अन्य शहरों की जरूरतें पूरी करते हैं. सोचता हूँ जहां ऐसी रेत दायिनी नदियाँ नहीं होती होंगी, वहाँ के लोग घर कैसे बनाते होंगे?
गोविन्द सिंह ‘हल्द्वानी लाइव’ में
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